Richest persons in bihar

Richest persons in Bihar.

1. Anil agarwal, born in patna(24th January 1954) – founder and chairman of Vedanta Resources PLC. He controls Vedanta Resources through Volcan Investments, a holding vehicle with a 100% stake in the business.

2. Ravindra Kumar Sinha, born in Jehanabad,Bihar (1st july 1954)- Ravindra Kumar Sinha is a Padma Shri awarded Indian biologist and environmentalist. Currently, he is Vice-Chancellor of Shri Mata Vaishno Devi University and formerly of Nalanda Open University.

3. Ravindra Kishore Sinha, born in Buxar, Bihar(22nd september, 1951)- also known as RK Sinha is an Indian billionaire businessman, politician and journalist. He is the founder of Security and Intelligence Services (SIS), a private security solutions provider in India and Australia. He is also a billionaire and member of Rajya Sabha.

4. Subrata roy, born in Araria, Bihar( 10th june 1948)- is an Indian businessman. He is the Managing Worker and Chairman of Sahara India Pariwar, an Indian conglomerate with diversified businesses and assets including Aamby Valley City, and India’s largest land bank spread in cities across India. Subhrata Roy Sahara founded the company in 1978.

5. Sanjay Kumar Jha, born in Sultanganj (1968)- is the former CEO of GlobalFoundries and former chairman and chief executive officer of Motorola Mobility. Prior to that he was the chief operating officer of Qualcomm. He began his career in 1994 as a senior engineer with the Qualcomm very large scale integration group working on the Globalstar satellite phone, and later on the first 13k vocoder application specific integrated circuit, which was integrated into Qualcomm’s MSM2200 chipset.


जलते बिहार की कहानी

जलते बिहार की कहानी।

अभी पूरे देश को जलते हुए हम देख रहे है, और साथ ही हमारा बिहार भी जल रहा है। अगर हम जानना चाहे की हमारे बिहार क्यों जल रहा है या इसे जलाने वाले कौन है? तो इसका जवाब किसी के पास नही है जो हमे संतुष्ट कर दे। असल मे ये जो हमारा बिहार जल रहा है इसके पीछे कोई वजह ही नही है, ना ही किसी नागरिक को कोई मुसीबतहै। ये तो बस उन राजनीतिक पार्टियों की गुस्सा है जो कुछ समय से देशभर में नकारे जा रहे है।


अगर हम हाल में हुए बिहार बंद की बात करे तो हमने देखा कि ये बंद समर्धको में किसी के पास जवाब नही थे कि उन्होंने ये बंद क्यों किया है। सब बस तोड़-फोड़ करने में लगे थे। किसी ने कहा कि गरीब मजबूर के लिए बंद किया है और वही कुछ जगहों पर उन्ही गरीब मजबूरो को बंद के वजह से काफी नुकसान उढ़ाना परा और कुछ जगहों पर तो उनसे मारपीट भी की गई। कई रिक्से वाले के रिक्से तोड़ दिए गए और कितने ही सरकारी सम्पति को जला दिया गया जो उन्ही गरीब और मजबूर लोगो के लिए होते है।


इस बार बिहार में लोगो ने दो दिन बंद के वजह से मुसीबते झेली और वो भी ऐसे कानून के खिलाफ जो अब तक देश या अपने राज्य में आई ही नही, मेरा इशारा NRC के तरफ है। दूसरे कानून CAB जो हमारे देश मे रहरहे नागरिको को कोई हक या अधिकार नही लेती नाही देश मे या हमारे राज्य बिहार में रहरहे लोगो से नागरिकता ले रही है। ये (CAB) तो केवल नागरिकता देने के लिए है, तो फिर यर बंद और तोड़-फोड़ क्यों?


Election in Bihar

Election results 2019 Bihar


Everyone know that the rulling government have to prove himself the better government than the earlier government to come to power again and again, but in state like Bihar something which matters more is which political party is supporting which class of people and what promising for Bihar is lost in this. The one who want to ask question about the work done for development of our state Bihar have to face problem and given tag like antinational and anti-Politicalparty and many more.


But we people of Bihar i.e know as bihari lost our pride and flowed in the fake promises and busy in fighting within own family like people of different castes and class. But this is the time when Bihar has the maximum number of youth and manforce power and this is the best opportunity for us to fight for our right and need together instead of fighting between ownself. If we see Bihar in this last 15 to 20 years then from central government, no extra donation or privilege or status is provided to us, only fake promises and superb formula been used i.e, divide and rule.


Why we give vote to political parties, we have to see before that wether that party is working or just making promises and then forget till there rulling period and then again remember that promises again in next election and this continues and never last. Bihar is state from where world learn about democracy and there republic rights and today we only forget this, or we acts like forgetten it. Why one family belong from there leader castes only give votes to there castes leader only, when we in Bihar move above this and join hand and vote to one who is right for us.


Giving opportunity twice to any political party is right situation, but on the basis of there work, that they complete the promises which is in progress but incomplete. But we give opportunity on the basis of our castes and then we cry of reservation and minorities class.


Now, in our state the next election of vidhan sabha is coming and this time we have to come ahead and make our precious vote to that party which work for our development and not on the basis of leader caste and there class. Nor we have to come in there fake promises and misguided us.



Once a time, Bihar was major part of world transportation and business. But now we are in a condition in which one can be thankful to god if they meet two time meal a day. If Bihar’s youth get job, then they think they are privileged. This all happens due to improper system and management of government in Bihar and for Bihar.


वशिष्ठ नारायण सिंह

वशिष्ठ नारायण सिंह

वशिष्ठ नारायण सिंह (जन्म : २ अप्रैल १९४२) एक भारतीय गणितज्ञ है। उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिला में बसंतपुर नाम के गाँव में हुआ। आजकल वे मानसिक बिमारी से पीडित है और बसंतपुर में ही रहते हैं। उन्होंने बर्कली के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से १९६९ में गणित में पी.एच.डी की डिग्री प्राप्त की।


डाक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह ने सन् 1962 बिहार में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। पटना विज्ञान महाविद्यालय (सायंस कॉलेज) में पढते हुए उनकी मुलाकात अमेरिका से पटना आए प्रोफेसर कैली से हुई। उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो कर प्रोफेसर कैली ने उन्हे बरकली आ कर शोध करने का निमंत्रण दिया। 1963 में वे कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में शोध के लिए गए। 1969 में उन्होने कैलीफोर्निया विश्वविघालय में पी.एच.डी. प्राप्त की। चक्रीय सदिश समष्टि सिद्धांत पर किये गए उनके शोध कार्य ने उन्हे भारत और विश्व में प्रसिद्ध कर दिया।


अपनी पढाई खत्म करने के बाद कुछ समय के लिए वे कुछ समय के लिए भारत आए, मगर जल्द ही वे अमेरिका वापस चले गए। इस बार उन्होंने वाशिंगटन में गणित के प्रोफेसर के पद पर काम किया। १९७१ में सिंह भारत वापस लौट गए। उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर और भारतीय सांख्यकीय संस्थान, कलकत्ता में काम किया।


1973 में उनका विवाह वन्दना रानी के साथ हुआ। 1974 में उन्हे मानसिक दौरे आने लगे। उनका राँची में इलाज हुआ। लम्बे समय तक वे गायब रहे फिर एकाएक वे मिल गये। उन्हें बिहार सरकार ने ईलाज के लिएं वेंगलुरू भेजा था। लेकिन बाद में ईलाज का खर्चा देना सरकार ने बंद कर दिया। एक बार फिर से बिहार सरकार ने विश्वविख्यात गणितज्ञ के इलाज के लिए पहल की है। विधान परिषद की आश्वासन समिति ने 12 फ़रवरी 2009 को पटना में हुई अपनी बैठक में डॉ॰ सिंह को इलाज के लिए दिल्ली भेजने का निर्णय लिया। समिति के फैसले के आलोक में भोजपुर जिला प्रशासन ने उन्हें रविवार दिनांक 12 अप्रैल 09 को दिल्ली भेजा. उनके साथ दो डॉक्टर भी भेजे गये हैं। दिल्ली के मेंटल अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों की परामर्श पर उन्हें आगे के खर्च का बंदोबस्त किया जाएगा. स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि दिल्ली में परामर्श के बाद यदि जरूरत पड़ी तो उन्हें विदेश भी ले जाया जा सकता है। अभी वे अपने गाँव बसंतपुर में उपेक्षित जीवन व्यतीत कर रहे थे। पिछले दिनों आरा में उनकी आंखों में मोतियाबिन्द का सफल ऑपरेशन हुआ था। कई संस्थाओं ने डॉ वशिष्ठ को गोद लेने की पेशकश की है। लेकिन उनकी माता को ये मंजूर नहीं है।



बिहार के युवाओ ने बाटि खुशियां, और लिया आश्रय के बड़ों का आशीर्वाद:

बिहार के युवाओ ने बाटि खुशियां, और लिया आश्रय के बड़ों का आशीर्वाद:

दिवाली, भारत देश में मनाया जाने वाला सबसे बडा़ त्यौहार है। दिवाली को पूरे भारत में खूब धूम धाम से मनाते हैं। आपको बता दें कि दिवाली सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि भारत के बाहर रहने वाले भारतीय और अन्य लोग भी बहुत धूम धाम से मनाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस त्यौहार में अपने परिवार अपने बच्चों को काफी याद करते हैं परंतु साथ में त्योहार मनाने का सौभाग्य उन्हें नहीं मिल पाता है। ऐसे ही कुछ लोग पटना शहर के आश्रय वृद्ध आश्रम में रहते हैं। और इस त्योहार के मौके पर कुछ नौजवानो ने आश्रय वृद्धाश्रम में अकेले रहने वाले बूढ़े सदस्यों के साथ दिवाली मनाए। उनके पहुंचते ही सभी सदस्यों के चेहरे पर रौनक आगई। सभी ने बहुत बेहतरीन तरीके से आश्रय को सजाया और उन सभी बड़ों के साथ एक खूबसूरत और शाम बिताया।

इन युवाओं का यह मानना है कि कोई भी त्योहार अगर बड़ों के आशीर्वाद के साथ बनाया जाए तो त्यौहार की खुशियों में चार चांद लग जाते हैं। खुशियां भी दुगनी चौगुनी बढ़ती है। युवाओं ने सदस्यों ने बड़े आदर पूर्वक सभी आश्रय सदस्यों के साथ धूमधाम से दिवाली मनाई। इस संस्था के सदस्यों ने सभी बड़ों के लिए एक सुंदर सा कार्ड भेंट किया और आशीर्वाद ली। आश्रय के सदस्यों ने भी संस्था के सदस्यों के साथ मिलकर फुलझड़ियां जलाएं और दिल खोलकर आशीर्वाद दिए।

जब विदाई का समय आया और सभी जाने लगे तब कुछ सदस्यों की आंखें नम हो गई। आश्रय और युवाओं के बीच एक ऐसा प्रेम भाव बन चुका था जैसा एक दादा – दादी और उनके पोते – पोती के बीच होता है। सभी दादा जी और दादी जी को यह समझाते हुए विदाई लिये “हम फिर जल्द आएंगे और आपके साथ और अच्छे पल बिताएंगे”।

बिहार नाओ उन तमाम युवाओं को इस अदभुत और महान कार्य के लिये कोटि – कोटि धन्यवाद और शुभकामनाएं करता है।


दशरथ मांझी जी की मेहनत।

Dashrath Manjhi (1934) – 17 August 2007, also known as Mountain Man, was a laborer in Gehlaur village, near Gaya in Bihar, India, who carved a path 110 m long (360 ft), 9.1 m (30 ft) wide and 7.6 m (25 ft) deep through a ridge of hills using only a hammer and chisel. After 22 years of work, Dashrath shortened travel between the Atri and Wazirganj blocks of Gaya town from 55 km to 15 km.


Native name  = दशरथ मांझी
Born.  = 1934 Gehlaur, Bihar, India
Died=17 August 2007 (aged 77–78) New Delhi, India
Other names= Mountain Man
Occupation =Laborer
Known for Manually carving a mountain in order to connect Gehlaur and Gaya
Spouse(s) = Falguni Devi.


Dashrath Manjhi was born into a Musahar family, at the lowest rung of India’s caste system. He ran away from his home at a young age and worked in the coal mines at Dhanbad. Later he returned to the village of Gehlaur and married Falguni (or Phaguni) Devi.
Gehlaur was and remains a small village with few resources, and while it lies in a plain it is bordered on the south by a steeply ascending quartzite ridge (part of the Rajgir hills) that prevented road access from the town of Wazirganj.


Manjhi was diagnosed with gallbladder cancer and was admitted to the All India Institute of Medical Sciences in New Delhi on 23 July 2007. He died at AIIMS on 17 August 2007. He was given a state funeral by the Government of Bihar.
For his feat, Manjhi became popularly known as the ‘Mountain Man’. The Bihar government also proposed his name for the Padma Shree award in 2006 in social service sector.
A stamp featuring Dashrath Manjhi was released by India Post in the “Personalities of Bihar” series on 26 December 2016.


After his return to Gehlaur, Manjhi became an agricultural laborer. In 1959 or 1960, Manjhi’s wife Falguni Devi was badly injured and died because the nearest town with a doctor was 55 km (34 mi) away. Some reports say she was injured while walking along a narrow path across the rocky ridge to bring water or lunch to Manjhi, who had to work away from the village at a location south of the ridge other reports link the path across the ridge to the delayed care but not to Falguni Devi’s injuries.
As a result of this experience Manjhi resolved to cut a roadway across the ridge to make his village more accessible. Manjhi felt the need to do something for society and decided to carve a path through the ridge so that his village could have easier access to medical care.
He carved a path 110 m long, 7.7 m deep in places and 9.1 m wide to form a road through the ridge of rocks. He said, “When I started hammering the hill, people called me a lunatic but that steeled my resolve.”
He completed the work in 22 years (1960–1982). This path reduced the distance between the Atri and Wazirganj sectors of the Gaya district from 55 km to 15 km. Though mocked for his efforts, Manjhi’s work has made life easier for people of the Gehlaur village. Later, Manjhi said, “Though most villagers taunted me at first, there were quite a few who lent me support later by giving me food and helping me buy my tools.
Official roads between his village and Wazirganj and Atri and Gaya were only built where his path was after his death in 2007.


तो ये है असली वासेपुर!

गैंगस्टर फहीम खान के बयान में ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कहानी

रात करीब 10, साढ़े 10 बजे रहे थे। मैं अपने ऑफिस में कुछ लोगों के साथ बैठा था। अचानक बाहर गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देने लगी। बाहर निकला, तो देखा कि गोलियों से छलनी मेरा निजी बॉडीगार्ड जमीन पर गिरा है। यह सब देख हम लोग घर की छत की तरफ दौड़े। अपने छत से पड़ोसी की छत पर कूद गया। कूदने से मेरा दाहिना पैर टूट गया। धनबाद के वासेपुर के कथित डॉन फहीम खान ने गुरुवार को जिला एवं सत्र न्यायाधीश 13 जनार्दन सिंह की कोर्ट में गवाही देते हुए यह कहानी बयां की।

फहीम की गवाही ने 29 जनवरी 2004 की वासेपुर की उस स्याह रात की यादों को ताजा कर दिया। फहीम ने कोर्ट को बताया कि गोली चलने से पहले वह अपने ऑफिस में टुन्नू खान, शाहिद कमर, बाबू और आफताब के साथ बैठा था। अंगरक्षक को अचेत देखकर वह ऊपर दौड़ा। ऊपर से झांकने पर देखा कि वाहिद, तबरेज, तनवीर , शहीद आलम, अशफाक, शहादत, मुन्ना मियां, अफाक आलम, पप्पू अगरबत्तीवाला, असगर आलम, साकेब खान ताबड़तोड़ गोलियां दाग रहे हैं। वे और उनके साथी जब पड़ोसी की छत पर कूद गए, तो थोड़ी देर में गोलियां चलनी बंद हो गईं। सुबह में उन्हें सूचना मिली की गोली चलाकर भागने के दौरान शूटरों की बेकारबांध में पुलिस से मुठभेड़ हो गई थी। इसमें एक शूटर और दो पुलिसवालों को गोली लगी थी। वहां दो शूटर पकड़े भी गए थे, जिन्होंने पुलिस को बताया था कि साबिर आलम के कहने पर उन्होंने मेरे घर पर हमला किया था।

गैंग्स ऑफ वासेपुर में फिल्माया गया है दृश्य

फहीम के घर पर हमले के दृश्यों को फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट 2 में फिल्माया गया है। फिल्म में नवाजुद्दीन (फैजल खान) को गोलियां से बचने के लिए छत से कूदते दिखाया है। हमलाकांड के ठीक नौ महीने बाद 18 अक्तूबर 2004 को फहीम की मां व मौसी की हत्या कर दी गई थी।


मैं गैंगस्टर नहीं : फहीम

कोर्ट परिसर में गुरुवार को समर्थकों से घिरे फहीम खान ने कहा कि वह गैंगस्टर नहीं है। उसने कभी चोरी नहीं की, कोई डकैती या रेप नहीं किया। वह तो बस अपनी मां और मौसी की हत्या का इंतकाम लेने के रास्ते पर चल रहा था। फहीम ने अपने भांजों के साथ नाम जुड़ने पर आपत्ति जताई।

फहीम को कड़ी सुरक्षा में धनबाद लाया गया

फहीम खान को गवाही के लिए कड़ी सुरक्षा में जमशेदपुर घाघीडीह जेल से धनबाद लाया गया था। एपीपी ब्रजेंद्र प्रसाद सिंह ने फहीम की गवाही कराई। इस मामले में कांड के मुख्य आरोपी साबिर आलम फरार हैं। गुरुवार को कांड के एक अन्य आरोपी अशफाक उर्फ डब्लू को बेउर जेल से धनबाद लाने के लिए एक ओवदन दाखिल किया गया है। न्यायालय ने आवेदन स्वीकृत कर लिया है।